एपिडेमिक इफेक्ट: माँ शीतला के कपाट बंद- ना आने की अपील, बिगड़ा घर का अर्थशात्र

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मंदिर के गेट पर लगा ताला
कौशाम्बी | Covid 19 के संभावित खतरे के बीच शक्तिपीठ माँ शीतला के कपाट अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिए गए है। यह पहला मौका है जब मंदिर की प्रबंध समिति ने भक्तो से अपील की है, कि वह अपने घरो सुरक्षित रहे माँ शीतला के दर्शन पूजन को मंदिर न आये. माँ के दर्शन पूजन के बंद होने के ऐलान के बाद इलाके के 3 हज़ार से अधिक लोगो के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. 
गौरतलब है कि सिराथू तहसील के कड़ा कसबे में माँ शक्ति की आराध्य देवी माँ शीतला का धाम है। जो 51 शक्तिपीठो में एक माना जाता है। पुराणों के अनुसार यहाँ पर देवादिदेव महादेव की पत्नी सती का “कर” (दाहिने हाथ का पंजा) गिरा था। तभी से कुंड में माता सती व् मूर्त रूप में माँ शीतला की पूजा अर्चना कर भक्त सुख शान्ति का आशीर्वाद पाते है।  
 
चैत्र माह की नवरात्र से पहले मंदिर प्रबंध समिति का ऐलान आर्थिक दृष्टिकोण से खासा मायने रखता है। समिति के अध्यक्ष शारदा प्रसाद उर्फ़ भुक्खड़ पण्डा ने बताया कि मंदिर परिसर की 1 हज़ार मीटर की परिधि में तकरीबन ढाई हज़ार पण्डा समाज, पुरोहित व् तीर्थ पुरोहित रहते है। जिनकी जीविका का साधन-संसाधन मंदिर में आने वाले भक्त व् दर्शनार्थी होते है। जिनको वह दुकानों के जरिये सिन्दूर, प्रसाद, खिलौने इत्यादि बेच कर जीविका चलाते है। 
मंदिर में चढ़ावे, प्रसाद, मिष्ठान, नाश्ता व् चाय-पान की दुकानों को मिलकर 800 करीब दूकानदार श्रद्धालुओं व् मंदिर आने वाले लोगो से अपनी जीविका चलते है। ऐसे में Covid 19 (कोरोना वाइरस) के संभावित खतरे को देखते हुए दर्शन पूजन बंद होने से आर्थिक विपन्नता व् भुखमरी का संकट स्थानीय लोगो के सामने खड़ा हो गया है। दुकानदार हरि मोहन पण्डा बताते है कि केवल नवरात्र के दिनों में माँ शीतला के दर्शन पूजन के लिए 10 लाख भक्त आते है। जिससे उनकी सालभर की आमदनी हो जाती है। उन्हें इधर उधर आर्थिक कारणों से भटका नहीं पड़ता। 
 
भौगोलिक लिहाज से माँ शीतला का कड़ा धाम गंगा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ आने वाले भक्त मंदिर में दर्शन पूजन के पहले गंगा स्नान अचमन करते है। नदी आधारित जीविका पर आश्रित नाविक परिवार भी कोरोना वाइरस इफेक्ट से खासे प्रभावित है | नाविक कमाता प्रसाद बताते है वह और उनके जैसे 200 परिवार मंदिर में दर्शन पूजन करने वाले श्रद्धालुओं के भरोसे ही अपना-अपने परिवार का पेट पालते है। अब वह भी बंद हो गया है। कब तक चलेगा कोई पता नहीं। 
 
कोरोना वाइरस इफेक्ट का सबसे ज्यादा असर मंदिर परिसर में इधर उधर रहने वाले याचक व् भिक्षुक पर हुआ है। भिक्षाटन कर अपना जीवन चलाने वाली रमैया को नहीं पता कि अचानक लोगो भीड़ बंद क्यों हो गई। पेट की आग बुझाने वाले अन्न का दाना भी अब मिलना मुश्किल हो गया है। परिसर में इनकी संख्या लगभग 400 के करीब मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष शारदा प्रसाद उर्फ़ भुक्खड़ पण्डा आंकते है | 
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