क्या मंदाकिनी को बचाने का काम करेंगे मोदी-योगी

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संदीप रिछारिया
(सीनियर एडीटर)

चित्रकूट। प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी दूसरी पारी में पहली बार 29 फरवरी को चित्रकूट आ रहे नरेंद्र मोदी के बारे में एक से ज्यादा स्थानों में जाने की चर्चा हो रही है। कभी स्वामी कातानाथ तो कभी रामघाट या कभी डीआरआई जाने की बात कही जा रही है। प्रशासन ने यूपी के क्षेत्र में तेजी दिखाते हुए दो नावों में पाच आदमियों को रामघाट में उतार दिया है। स्थानीय लोगों व पंडा समाज का कहना है कि सफाई का काम तो केवल उपर उपर हो रहा है। नदी के अंदर हजारों गंदी बोरियां दबी पड़ी हैं। उनको निकालने के लिए प्रशासन कोई पहल नही कर रहा है। वैसे अगर नदी का पौराणिक महत्व देखा जाए तो सतयुग में प्रजापिता ब्रहमा जी के द्वारा प्रकट किए गए महिर्षि अत्रि की पत्नी महासती अनुसुइया जी की दस हजार सालों की साधना का परिणाम सह्त्र हजार धाराओं के रूप में मंदाकिनी के रूप में परिलक्षित हुआा। तब से लेकर आज तक यह पावन धारा चित्रकूटवासियों की प्यास को लगातार बुझाने का काम लगातार करती रही। कुछ वर्षों पहले इसके अपनों ने ही मंदाकिनी के न केवल तन बल्कि मन को भी मैला करने में कोई कोर कसर नही छोडी। हाल यह हुआ कि जो बेटे लगातार मंदाकिनी को मां-मां कहकर बुलाते, पूजा, भेाग व आरती करते, उन्हीं ने इसके पावन जल को मैला करने के सभी प्रयास पूरी तरह से किए। यह बात और है कि जब कभी उनका मन होता तो मंदाकिनी के प्रदूषण पर चिंता व्यक्त कर अखबारों में अपनी फोटो आदि छपवाकर यह बताने का प्रयास करते कि वह मंदाकिनी के सबसे बडे हितैसी हैं। वैसे चित्रकूट में मंदाकिनी अकेली नही है, प्रजापिता ब्रहमा जी द्वारा उत्पन्न विश्व की पहली नदी पयस्वनी और सरयू ( सावित्री) मिलकर इसे त्रिवेणी बनाती हैं। राघव प्रयाग घाट तीनों नदियों का संगम होता हैा यहां पर भगवान श्री राम ने अपने पिता महाराज दशरथ का पिंड तर्पण किया था। पितृ विसर्जन अमावस्या पर स्वयं प्रयागराज यहा पर आकर अपने पापों को छोडकर जाते हैं।

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महाकवि तुलसीदास जी ने अपनी अमर कृति श्री राम चरित मानस में लिखा है

‘नदी पुनीत पुराण बखानी, अत्रि प्रिय निज तप बल आनी, सुरसरि धार नाउं मंदाकिनी, यह सब पोतक पातक डाकिनी।’

इसी नदी के किनारे उन्हें श्री राम जी के साथ हनुमान जी के दर्शन हुए। आज के परिवेश में देखें तो मंदाकिनी के प्रदूषण पर सर्वाधिक हल्ला मचाने वाले संत, महंत और व्यापारी ही प्रदूषण के सबसे बडे कारक हैं। मंदाकिनी के किनारे तमाम मठ मंदिर व मकानों के साथ ही परिक्षेत्र के विस्तारीकरण के कारण निकलने वाले मैला व कचरा सीधे मंदाकिनी में जा रहा हैा सीवर के पाइप सीधे तौर पर नदी में डाले जा रहे हैं। सब मिलकर बात करते हैं, और फिर आपस में मेरी भी चुप तेरी भी चुप करके शांत हो जाते हैं। बडे बडे मठाधीश अखबारों व चैनलों में अपना चित्र व बयान के लिए अपने आपको मंदाकिनी का सबसे बडा हितैयी बताते हैं, लेकिन जब काम करने की बात आती है तो वह लोग खुद को अलग कर लेते है। पिछले दिसंबर की 9 तारीख को भरत घाट पर भी दिन भर मंदाकिनी के प्रदूषण को समाप्त करने के लिए नाटक खूब चला। अत्तोगत्वा बाद में सब पाक साफ हो गए और मंदाकिनी का प्रदूषण भी माइक के जरिए समाप्त हो गया। आगे की किस्तों में आपको मंदाकिनी के प्रदूषण के उन तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया जाएगा, जो मंदाकिनी के प्रदूषण के मुख्य कारक हैं। इसके साथ ही यह भी बताने का प्रयास किया जाएगा कि मंदाकिनी के प्रदूषण को समाप्त करने के लिए कितना प्रयास समाज सेवियों का है और कितना सरकारी। इस मुहिम में हम अकेले हैं लेकिन आप सभी का साथ अपेक्षित हैा अगर हम सब मिलकर इस मुहिम को आगे बढाएंगे तो निश्चित तौर पर मंदाकिनी के उन गुनहगारों को सामने ला सकेगे, जिन्होंने मंदाकिनी के नाम पर अपनी रोटियां सेंकी और मंदाकिनी को और अधिक गंदा किया।

अब देखना यह होगा कि प्रधानमंत्री जी के आगमन पर रामघाट के इलाके में नदी को किस तरह से किस प्रकार साफ किया जाएगा या फिर एक बार सिंचाई विभाग करोड़ों के बजट का खर्च बताकर अपना हाथ साफ कर लेगा।

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