गौ आधारित कृषि – गौवंश बचाने की नई कवायद

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कौशाम्बी। गौवंश बचाने के लिए अब गौ आधारित कृषि की मदद ली जाएगी। गौ आधारित कृषि यानि, गाय पर आधारित खेती की परंपरा। इस परंपरा में गाय की सेवा भी ग्रामीण जनता करती है और गाय से मिलने वाले गोबर और मूत्र से तैयार होने वाली खाद “जीवामृत“ के प्रयोग से मिटटी की गुणवत्ता भी सुधारी जा सकती है। इस परिकल्पना को कौशाम्बी के एक छोटे से गांव देवरा में राजेंद्र प्रसाद साकार करने की कोशिश में लगे हैं।
         वैसे देश में गौ आधारित खेती का बहुत पुराना इतिहास है। वैदिक काल में खेती का मुख्य कारण कृषि का गौ आधारित होना ही था। उस युग में प्रत्येक घर में गोपालन एवं पंचगव्य आधारित कृषि होती थी। भारतीय मनीषियों ने संपूर्ण गौवंश को मानव के अस्तित्व, रक्षण, पोषण, विकास एवं संवर्धन के लिये आवश्यक समझा और ऐसी व्यवस्थाऐं विकसित की थी जिसमें जनमानस को विशिष्ट शक्ति बल तथा सात्विक वृद्धि प्रदान करने हेतु गौ दुग्ध, खेती के पोषण हेतु गोबर-गौमूत्र युक्त खाद, कृषि कार्यां एवं भार वहन हेतु बैल तथा ग्रामोद्योग के अंतर्गत पंचगव्यों का घर-घर में उत्पादन किया जाता था।
        मूरतगंज विकास खण्ड के नरवर पट्टी के मजरा देवरा के मूलतः रहने वाले पण्डित दीनदयाल धाम के पूर्व निदेशक राजेंद्र प्रसाद ने गांव के गौरव को वापस दिलाने का गौ आधारित खेती सपना देखा था। जिसे साकार करने के लिए उन्होंने गौ माता को आधार बनाया। उन्होंने अपनी गौ शाला श्री कृष्ण कामधेनु गौशाला में देशी गायों का पालन शुरू किया। उन्होंने सबसे पहले गांव के युवा बेरोजगार बच्चों और बच्चियों को आत्म-निर्भर बनाने की दिशा में काम शुरू किया। इसके लिए उन्होंने 2018 में एक ट्रस्ट का निर्माण कराया। इसके जरिये उन्होंने गांव की विलुप्त हो रही परंपरा को जीवंत करने का प्रयास शुरू किया, जिसमें वह ग्राम पुस्तकालय, लड़कियों के लिए सिलाई कढ़ाई प्रशिक्षण, युवको के लिए जैविक खेती के महत्त्व के साथ गौ आधारित खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। गाय आधारित खेती को अपना कर राजेंद्र प्रसाद ने सबसे पहले अपने खेतां में प्रयोग किया। जिसके नतीजे एक साल बाद अब चौकाने वाले हैं। जो खेत रासायनिक उवर्रक के प्रयोग से अनाज की पैदावार देते और ज्यादा से ज्यादा सिचाई लेते थे, वह गाय के मल-मूत्र से तैयार जीवामृत नमक जैविक उवरक से बंजर हो रही जमीन को संजीवनी दी है।

 

        राजेंद्र प्रसाद बताते है कि गाय अपने आप में चलता फिरता चिकित्सालय है। जिसका जितना प्रयोग मानव जीवन के लिए उपयोगी है उससे कहीं ज्यादा उपयोगी खेतो के लिए है। उन्होंने बताया कि खेतों के लिए जीवामृत किसी अमृत से कम नहीं है। इसके प्रयोग से खेत में मृतप्राय हो चुके मित्र कीड़े नवजीवन पाते हैं और एक नई ऊर्जा के साथ जमीन की उर्वरा शक्ति को तैयार करने में लग जाते हैं। प्रकृति के अनुपम उपहार गौ आधारित कृषि के गुण सीखने वाले युवा भी बताते है कि वह अब शहरों की चकाचौंध से बेहतर गांव की शांत खेत और पक्षियों के कलरव है, जिसमे वह अपनी जीवन की गाड़ी को भी बेहतर तरीके से चला रहे हैं। भारतीय संस्कृति में गाय का महत्व, गायत्री, गंगा और गीता से भी बढ़कर है। 
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