विश्व समुदाय को खाद्य प्रदान करने में मधुमक्खियों का महत्वपूर्ण योगदान है- डा0 यू0एस0 गौतम, कुलपति

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संदीप रिछारिया

बांदा। मधुमक्खी प्रकृति का अनमोल बरदान है। मधुक्खियों के द्वारा सभी फसलों के अनुवांशिक रूप से उपयोगी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है। महान वैज्ञानिक आईनस्टीन ने कहा था कि अगर मधुमक्खियां प्रकृति से विलुप्त हो जाये तो मनुष्य अधिकतम चार वर्ष तक जीवित रह सकता है। बुन्देलखण्ड परिक्षेत्र में दलहनीय और तिलहनीय फसलों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की साब्जियां एवं जगली पौधे पाये जाते है जो कि मधुमक्खियों द्वारा शहद बनाने में सहायक है। बुन्देलखण्ड में इसे कृषि के साथ व्यवसाय के रूप में अपनाया जा सकता है। यह बाते कृषि विश्वविद्यालय, बांदा के कुलपति, डा0 यू0एस0 गौतम ने मधुमक्खी पालन पर आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुये कही।

डा0 गौतम ने कहा कि बुन्देलखण्ड के कृषक कृषि के अन्य उपक्रमों के साथ-साथ मधुमक्खी पालन का व्यवसाय कर सकते है जिससे अतरिक्त आय के साथ-साथ फसल उत्पादन में भी वृद्धि होगी। बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा के उद्यान महाविद्यालय के कन्फ्रेन्स हाॅल में ‘‘कृषको की आय दुगनी करने के लिए व्यवसाय के रूप में मधुमक्खी पालन की भूमिका‘‘ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन राष्ट्रीय कृषि विकास योजना मद से किया जा रहा है। कृषि महाविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग में डा0 ए0के0 सिंह, प्रधान शोध कर्ता के नेतृत्व में परियोजना चल रही है। इस संगोष्ठी में बुन्देलखण्ड के 06 जिलों के कृषक तथा कृषि विज्ञान केन्द्रों के वैज्ञानिक तथा कानपुर, लखनऊ, वाराणसी तथा प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के लगभग 150 वैज्ञानिक एवं छात्र प्रतिभाग कियें। इस राज्य स्तरीय संगोष्ठी में बुन्देलखण्ड में मधुमक्खी पालन की सम्भावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गयी।

संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि के रूप में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्र विभाग के प्राध्यापक प्रो0 एच0पी0 सिंह ने अपने सम्बोधन में कहा कि मधुमक्खी पालन फायदे का सौदा है। रायल जेली (शहद) की कीमत 5000-6000 प्रति किलो होती है। कृषक एक बाॅक्स से एक सीजन में 01 किलो रायल जेली (शहद) प्राप्त कर सकता हैं। उन्होने बताया कि एक कृषक व्यवसाय के रूप में 20-25 बाॅक्स की इकाई से वर्ष में 3 लाख 60 हजार तक आय प्राप्त कर सकता हैं। संगोष्ठी के आयोजक सचिव एवं प्रधान शोध कर्ता डा0 ए0के0 सिंह ने बताया कि शहद के अलावा मधुमक्खी पालन से शहद, वैक्स, प्रोपैलिस, पाॅलेन, रायल जेली, मौनविष भी प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान में कई विकसित देशो में मधुमक्खी बाॅक्स को बागो में एवं खेतो में किराया लेकर रखा जा रहा है। मौनविष की कीमत अन्तराष्ट्रीय बाजार में 10-12 हजार प्रति ग्राम हैं। चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर के कुलसचिव डा0 एच0पी0 सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के समस्त अधिकारी, अधिष्ठातागण, प्राध्यापक, छात्र एवं छात्रायें उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन सहायक प्राध्यापक डा0 धीरज मिश्रा ने किया ।

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