रायबरेली -बिजली जैसी मूलभूत आवश्यकता को लेकर देश में जिस प्रकार प्रीपेड स्मार्ट मीटर व्यवस्था को तेजी से लागू किया जा रहा है, वह अब सुविधा से अधिक असुविधा का पर्याय बनती जा रही है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बदलाव वास्तव में उपभोक्ताओं के हित में है, या फिर यह केवल व्यवस्था को आसान बनाने का एकतरफा प्रयास है, जिसका भार सीधे आम जनता पर डाल दिया गया है।
पारंपरिक पोस्टपेड प्रणाली में उपभोक्ता को एक भरोसा था—वह बिजली का उपयोग करता था और निर्धारित समय पर उसका भुगतान करता था। यह व्यवस्था न केवल व्यवहारिक थी, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संतुलन को भी बनाए रखती थी। इसके विपरीत, प्रीपेड स्मार्ट मीटर ने “पहले भुगतान, फिर उपभोग” का ऐसा कठोर नियम लागू कर दिया है, जो विशेषकर निम्न और मध्यम वर्ग के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
यह व्यवस्था उस वर्ग के लिए और अधिक कठिन है, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा है। अब उसे हर समय इस चिंता में जीना पड़ता है कि कहीं बिजली का बैलेंस समाप्त न हो जाए। यह चिंता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक तनाव का भी कारण बन रही है। बार-बार मीटर चेक करना, अचानक कटौती का भय, और “माइनस” बैलेंस की उलझन—ये सब मिलकर आम आदमी के जीवन को अस्थिर बना रहे हैं।
तकनीक का उद्देश्य जीवन को सरल बनाना होता है, लेकिन जब वही तकनीक जटिलता और असुरक्षा पैदा करने लगे, तो उसकी उपयोगिता पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है। जमीनी स्तर पर सामने आ रही शिकायतें—जैसे गलत रीडिंग, तेजी से बैलेंस खत्म होना, और नेटवर्क संबंधी समस्याएं—यह संकेत देती हैं कि यह प्रणाली अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गंभीर विषय पर जनप्रतिनिधियों की आवाज़ अपेक्षाकृत धीमी या नदारद है। लोकतंत्र में जनसमस्याओं को उठाना और उनका समाधान खोजना जनप्रतिनिधियों की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। यदि वे इस मुद्दे पर सक्रिय नहीं होते, तो यह जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
यह भी समझना आवश्यक है कि बिजली कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। इसे एक “रिचार्ज उत्पाद” के रूप में देखना न केवल संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देता है।
सरकार और संबंधित विभागों को चाहिए कि वे इस व्यवस्था की खामियों का गंभीरता से मूल्यांकन करें। उपभोक्ताओं को न्यूनतम बैलेंस की बाध्यता में कुछ राहत दी जाए, तकनीकी खामियों को दूर किया जाए और एक ऐसी प्रणाली विकसित की जाए, जो वास्तव में जनहित में हो।
अंततः, तकनीक तभी सार्थक है जब वह आम आदमी के जीवन को सहज बनाए, न कि उसे हर दिन एक नई चिंता के साथ जीने पर मजबूर कर दे।अनुज मौर्य /मनीष श्रीवास्तव
(अधिवक्ता एवं सामाजिक विश्लेषक)
अनुज मौर्य /मनीष श्रीवास्तव
(अधिवक्ता एवं सामाजिक विश्लेषक)


