बाँदा मे मुस्लिम परिवार बना रहा है दशहरे के लिए रावण, यहाँ आज भी जिंदा है गंगा-जमुनी तहजीब

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बाँदा -वैसे तो दशहरा का पर्व पुरे देश मे मनाया जाता है लेकिन इस दशहरे के पर्व का बाँदा वालों के लिए अलग ही महत्त्व है यहाँ हिन्दू भाइयो के लिए मुस्लिम परिवार 8 दशक से दशहरे के लिए रावण के विशालकाय पुतले बना रहा है। उसकी चार पीढ़ियां इस कार्य को करती चली आ रही है।

यह है बाँदा शहर का खुटला इलाके का मोदी मंदिर का मुहल्ला यहाँ काम कर रहे ये लोग कोई और काम नहीं कर रहे है बल्कि ये दशहरे के लिए विशालकाय रावण के पुतले का निर्माण कार्य कर रहे है। तुफैल अहमद अपने परिवार के साथ यह कार्य करते है तुफैल अहमद बताते हैं कि उनके परदादा ने इसकी शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक उनके परिवार का हर सदस्य दशहरा आते ही बांस, कागज, सुतली, कपड़े और रंगों से रावण के पुतले को आकार देने में जुट जाता है।

जहां देश में अक्सर धर्म के नाम पर दूरियां बढ़ाने की खबरें आती हैं, वहीं बुंदेलखंड के बांदा मे हिन्दुओं और मुस्लिमों के सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनूठी और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहां एक मुस्लिम परिवार पिछले 8 दशक के अधिक समय से से दशहरे के लिए विशालकाय रावण के पुतले का निर्माण कर रहे है यह कार्य करते हुए इनकी यह चौथी पीढ़ी है, तुफैल अहमद बताते हैं कि उनके परदादा ने इसकी शुरुआत की थी। तब से लेकर आज तक उनके परिवार का हर सदस्य दशहरा आते ही बांस, कागज, सुतली, कपड़े और रंगों से रावण के पुतले को आकार देने में जुट जाता है।


तुफैल ने बताया कि पहले सामान सस्ते दाम में मिल जाता था, लेकिन अब बांस, कागज, सुतली और रंगों की बढ़ती कीमतों के कारण एक बड़ा रावण बनाने में काफी खर्च आता है। कई बार तो मेहनत के हिसाब से मजदूरी भी पूरी नहीं मिल पाती। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी यह काम नहीं छोड़ा।

वही तुफैल अहमद ने बताया कि यह हमारे लिए सिर्फ बिजनेस नहीं है। यह हमारी पुश्तैनी परंपरा और सामाजिक जिम्मेदारी है। रावण का पुतला बनाना हमारे लिए रोजगार से ज्यादा बांदा की मिली-जुली संस्कृति को जीवित रखने का जरिया है।

खास बात यह है कि अब उनकी अगली पीढ़ी भी इस कला को सीख रही है । उनके बच्चे स्कूल से लौटकर पिता के साथ बांस की खपच्चियों को तराशना, कागज चिपकाना और पुतले को रंगना सीखते हैं। बांदा शहर का विजयादशमी उत्सव वैसे भी पूरे यूपी में अलग माना जाता है। यहां एक दिन नहीं, बल्कि कई दिनों तक अलग-अलग मोहल्लों में रावण दहन के मेले लगते हैं।

वही स्थानीय प्रेम प्रकाश व भानु प्रकाश ने बताया कि तुफैल अहमद के हाथों बना रावण हर साल दशहरा मैदान में जलता है और उसी आग में जल जाती हैं नफरत की दीवारें। उनका परिवार यह साबित करता है कि बांदा की संस्कृति किसी एक धर्म की नहीं, बल्कि सभी धर्मों के संगम की संस्कृति है।

कुछ भी हो सारे देश मे जातिवाद कि लड़ाई सुनने मे आती है लेकिन जिस तरह से बुंदेलखंड के बाँदा मे मुस्लिम परिवार द्वारा हिन्दुओं के पर्व दशहरा के लिए रावण का निर्माण कर अपना सहयोग दिखाते है उससे वास्तव मे एकता कि एक अनोखी मिशाल देखने को मिलती है।

सुधीर त्रिवेदी रिपोर्ट

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