UttarPradesh Desk -डॉ रुमा परवीन जो मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता सरकारी सूचीबद्ध मनोवैज्ञानिक प्रेरक वक्ता
सरकारी सूचीबद्ध अध्यक्ष – लैंगिक उत्पीड़न निवारण समिति (पीओएसएच)
जनपद रायबरेली, उत्तर प्रदेश द्वारा बताया गया की आज देशभर में बोर्ड परीक्षाएँ शुरू होते ही घरों का माहौल बदल जाता है—दीवारों पर टाइम-टेबल लग जाते हैं, मोबाइल सीमित हो जाते हैं और बातचीत कम होकर अपेक्षाएँ बढ़ जाती हैं, लेकिन इस बदलाव का सबसे गहरा असर बच्चों के मन पर पड़ता है। एक मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के रूप में वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि परीक्षा के समय बच्चों में सबसे अधिक भावना डर की होती है—असफलता का नहीं, बल्कि अपेक्षाओं, तुलना और “लोग क्या कहेंगे” के दबाव का। आज परीक्षा का तनाव सामान्य घबराहट तक सीमित नहीं रह गया है, कई बच्चे तेज धड़कन, हाथ कांपना, नींद न आना, रोना या अचानक सब भूल जाने जैसी स्थिति में पहुँच जाते हैं, जिसे परीक्षा-भय या पैनिक प्रतिक्रिया कहा जाता है। अत्यधिक दबाव में मस्तिष्क “फाइट या फ्लाइट” मोड में चला जाता है जिससे याददाश्त अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में बच्चों को डाँट या ताने नहीं, बल्कि विश्वास और सहयोग की आवश्यकता होती है, क्योंकि दबाव में दिमाग सिकुड़ता है और विश्वास में खिलता है।
यह भी समझना आवश्यक है कि हर बच्चा अलग क्षमता और गति से सीखता है। सभी बच्चों को एक ही मापदंड पर तौलना उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। परीक्षा केवल ज्ञान का मूल्यांकन है, जीवन का नहीं। बच्चों को यह महसूस कराना जरूरी है कि उनके माता-पिता का प्यार और समर्थन अंकों से बड़ा है। परीक्षा के दिनों में बच्चों को पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और छोटे-छोटे विश्राम भी मिलना चाहिए, क्योंकि थका हुआ मन जल्दी घबराता है।
राहत के लिए ग्राउंडिंग तकनीक जैसे 5 चीजें देखना, 4 छूना, 3 आवाजें सुनना, 2 खुशबू पहचानना और 1 स्वाद महसूस करना उपयोगी है, साथ ही गहरी साँस लेने की प्रक्रिया से शरीर का तनाव संतुलित हो सकता है। सकारात्मक आत्मसंवाद भी अत्यंत आवश्यक है—“मैं नहीं कर पाऊँगा” के स्थान पर “मैंने तैयारी की है, मैं प्रयास करूँगा” जैसी सोच बच्चे को मानसिक शक्ति देती है।
विद्यालयों और शिक्षकों की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि स्कूल परीक्षा के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें, तो बच्चों में आत्मबल बढ़ सकता है। परीक्षा के समय परामर्श सत्र, प्रेरक संवाद और सहानुभूतिपूर्ण वातावरण बच्चों को सुरक्षित महसूस कराता है। यदि किसी बच्चे को अत्यधिक तनाव या पैनिक महसूस हो तो KIRAN Mental Health Helpline 1800-599-0019 पर तुरंत संपर्क किया जा सकता है।
अभिभावकों से निवेदन है कि वे बच्चों पर अपनी महत्वाकांक्षा का बोझ न डालें। तुलना से आत्मविश्वास घटता है जबकि सहयोग से आत्मबल बढ़ता है। बच्चों के लिए संदेश है कि परीक्षा उनकी पूरी पहचान नहीं है, यह जीवन की एक परीक्षा है अंतिम निर्णय नहीं। असफलता एक पड़ाव हो सकती है, पर आत्मविश्वास जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। यदि हमें मानसिक रूप से सशक्त भारत बनाना है तो परीक्षा के समय बच्चों के मन की सुरक्षा करनी होगी, क्योंकि सफल राष्ट्र वही है जहाँ बच्चे डर से नहीं, सपनों से पढ़ते हैं।
अनुज मौर्य रिपोर्ट


