रायबरेली में अवैध वसूली का बड़ा खेल! नगर पालिका, जिला पंचायत और कर्मचारियों की मिलीभगत से खुलेआम लूट का आरोप

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रायबरेली डेस्क –रायबरेली जिले के नगर पालिका क्षेत्र में अवैध वसूली का एक बड़ा खेल सामने आया है। शहर के लगभग सभी बॉर्डर प्वाइंटों पर, खासकर शारदा नहर और सारस चौराहा से सुल्तानपुर रोड तक, ऑटो, सीएनजी ऑटो, ई-रिक्शा और मिनी बस चालकों से बिना किसी टोकन, बिना रसीद और बिना वैध ठेके के खुलेआम वसूली किए जाने का आरोप लगा है। हैरानी की बात यह है कि यह पूरा खेल जिम्मेदार विभागों की नाक के नीचे चल रहा है, जबकि मौके पर ट्रैफिक पुलिस और रूट व्यवस्था संभालने वाले कर्मचारी भी तैनात रहते हैं।

स्थानीय वाहन चालकों के अनुसार, नगर पालिका के नाम पर प्रति ऑटो ₹35 सरकारी शुल्क तय है, लेकिन मौके पर ₹70 तक की वसूली की जा रही है। सबसे गंभीर बात यह है कि चालकों को किसी प्रकार की पर्ची या रसीद नहीं दी जाती। ई-रिक्शा और सीएनजी ऑटो चालकों से भी इसी तरह नकद वसूली हो रही है। बताया जा रहा है कि शारदा नहर पर बैठने वाले नगर पालिका कर्मियों और अवैध वसूली करने वालों के बीच सांठगांठ हो चुकी है।

सूत्रों का कहना है कि यह पूरा खेल इसलिए खेला जा रहा है ताकि रिकॉर्ड में कम वसूली दिखाई जा सके और भविष्य में वसूली का ठेका फिर से उन्हीं लोगों को दे दिया जाए जो पहले से इस धंधे में शामिल रहे हैं। वाहन चालकों का आरोप है कि विभागीय कर्मचारी खुद वसूली कर रहे हैं ताकि कोई बाहरी व्यक्ति सवाल न उठा सके।

जिला पंचायत की वसूली को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। नियम के मुताबिक यह वसूली मलिन का पुरवा में होनी चाहिए, लेकिन वसूली शारदा नहर पर की जा रही है। सरकारी शुल्क जहां ₹10 बताया जा रहा है, वहीं चालकों से ₹20 तक वसूले जा रहे हैं। इतना ही नहीं, स्थानीय लोगों का दावा है कि जिला पंचायत का कोई वैध ठेका ही मौजूद नहीं है, फिर भी वसूली बदस्तूर जारी है।

सारस चौराहा से सुल्तानपुर रोड पर केवल करीब 30 टेंपो संचालित होते हैं। नियमानुसार इनसे ₹35 लिए जाने चाहिए, लेकिन मौके पर ₹55 तक वसूले जा रहे हैं। मिनी बस संचालकों की हालत भी अलग नहीं है। इस रोड पर चलने वाली 12 मिनी बसों में से केवल 4 बसों को ही रसीद दी जाती है, बाकी से बिना हिसाब-किताब पैसा लिया जाता है। सरकारी दर ₹70 से ₹150 के बीच होने के बावजूद एक चक्कर का ₹200 तक वसूला जा रहा है।

सीएनजी ऑटो चालकों का कहना है कि उनसे प्रतिदिन ₹35 से ₹40 तक नकद वसूली की जाती है, लेकिन बदले में कोई सरकारी दस्तावेज नहीं दिया जाता। सवाल यह उठता है कि आखिर यह पैसा किसकी जेब में जा रहा है? अगर यह सरकारी वसूली है तो रसीद क्यों नहीं दी जाती, और अगर अवैध है तो जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे?

सबसे बड़ा सवाल ट्रैफिक पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर उठ रहा है। जिस चौराहे पर 12 घंटे पुलिस और रूट कर्मचारी तैनात रहते हैं, वहां खुलेआम हो रही इस अवैध वसूली पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासन जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है या फिर इस पूरे खेल में ऊपर तक सेटिंग है?

अब जरूरत है कि जिला प्रशासन, नगर पालिका और जिला पंचायत इस मामले की निष्पक्ष जांच कराए। अवैध वसूली में शामिल कर्मचारियों और ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई हो, अन्यथा यह साफ माना जाएगा कि जनता और वाहन चालकों की जेब काटने का यह संगठित खेल प्रशासनिक संरक्षण में चल रहा है।

अनुज मौर्य रिपोर्ट

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