रायबरेली। सदर तहसील इन दिनों लेखपालों और राजस्व निरीक्षकों के तबादलों को लेकर चर्चाओं के केंद्र में है। आरोप है कि तहसील प्रशासन ने बिना किसी सार्वजनिक सूचना और बिना तबादला सूची जारी किए कई लेखपालों और राजस्व निरीक्षकों के कार्यक्षेत्र बदल दिए हैं। हालात यह हैं कि क्षेत्र की जनता अपने पुराने लेखपालों को खोज रही है और नए लेखपालों की जानकारी के लिए तहसील के चक्कर काटने को मजबूर है।
सूत्रों के मुताबिक, राजस्व निरीक्षकों द्वारा गुपचुप तरीके से लेखपालों को नए क्षेत्रों का कार्यभार सौंप दिया गया है, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक सूची सार्वजनिक नहीं की गई। इससे ग्रामीणों और फरियादियों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र, वरासत, पैमाइश और अन्य राजस्व संबंधी कार्यों के लिए आने वाले लोगों को यह तक पता नहीं कि उनके क्षेत्र में अब कौन सा लेखपाल तैनात है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर तबादला सूची को सार्वजनिक करने पर रोक किसकी है? यदि प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो फिर सूची को जनता से छिपाने की क्या मजबूरी है? क्या किसी विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाने या मनमाने तरीके से क्षेत्रों का बंटवारा करने के लिए यह पूरा खेल खेला गया?
हैरानी की बात यह भी है कि जिस जिले में प्रदेश सरकार के दो-दो मंत्री मौजूद हैं, वहां की जनता को इतनी बुनियादी जानकारी के लिए परेशान होना पड़ रहा है। तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। लोगों का कहना है कि यदि तबादलों में कोई अनियमितता नहीं है तो तत्काल सूची जारी कर पूरे मामले को सार्वजनिक किया जाए।
जनता का आरोप है कि तहसील प्रशासन की अपारदर्शी व्यवस्था के कारण आम लोगों का समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहे हैं। ग्रामीणों को अपने कार्यों के लिए कई-कई बार तहसील के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, लेकिन कोई जिम्मेदार अधिकारी स्पष्ट जानकारी देने को तैयार नहीं है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर तबादला सूची सार्वजनिक करता है या फिर सदर तहसील में गुपचुप तबादलों का यह खेल यूं ही चलता रहेगा। फिलहाल जनता के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है—आखिर अपने ही क्षेत्र के लेखपाल को खोजने के लिए लोगों को क्यों भटकना पड़ रहा है और इस गोपनीयता के पीछे कौन है?
अनुज मौर्य रिपोर्ट


