राकेश कुमार अग्रवाल
रविवार सुबह की बात है जब मैं फेसबुक चला रहा था . मेरी टाइमलाइन पर आई एक पोस्ट ने मुझ जैसे व्यक्ति को भी विचलित कर दिया था . जिस व्यक्ति ने पोस्ट डाली थी वह एक राजनीतिक दल से जुडा नवयुवक था . कुछ दिनों से वह बीमार है एवं उसका इलाज चल रहा है . पोस्ट में उसने अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए लिखा कि लगता है मेरा अंत समय आ गया है . मैं कुछ दिनों का मेहमान हूं . मेरे से जाने अनजाने में कोई गल्ती हुई हो या मैंने किसी का दिल दुखाया हो तो मुझे माफ कर देना . उक्त पोस्ट यह साबित कर रही थी कि व्यक्ति मन से भी हार बैठा है एवं उसे अपने बचने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है . यह परिदृश्य घोर निराशावाद का द्योतक है .
ऐसे में रह रहकर कबीर के उस दोहे की पंक्तिया याद आ रही हैं जिसमें उन्होंने मानव मन को सर्वोपरि बताते हुए कहा था कि ‘ मन के हारे हार है , मन के जीते जीत ‘ . कोरोना काल में जब मौतों का विस्मयकारी आँकडा लोगों का दिल दहला रहा है . न जाने कितनों ने कितने अपनों को खो दिया है . ऐसे में जो भी खबरें आ रही हैं वे संबल बनने के बजाए और भी ज्यादा खौफ पैदा कर रही हैं . दृढ इच्छाशक्ति और कठोर ह्रदय वाले लोग भी भयभीत हो गए हैं . किसी दूसरे शहर में रह रहे परिजनों , रिश्तेदारों या मित्रों का यदि फोन आ जाता है तो लोगों की रूह कांप जाती है कि फिर से कोई अशुभ खबर आ गई है क्या ?
अत्याधुनिक संचार सेवाओं ने डर को बढाने के काम को कम करने के बजाए बढावा ही दिया है . मीडिया में तो फिर भी सेंसरशिप की गुंजाइश रहती है लेकिन सोशल मीडिया पर तो ऐसी पोस्टों की बाढ आ गई हैं जिनको देख देखकर इंसान का मन व्यथित हो जाए . हालात यह हैं कि पूरा सोशल मीडिया नकारात्मक खबरों , सूचनाओं , जानकारियों व नाउम्मीदियों से भरा पडा है . जिससे आजिज आकर मेरे साथी कैमरामैन मुकेश कुमार ने तो कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से ही तौबा कर ली है . उनके अनुसार यह सब खबरें अवसाद और तनाव का वाहक बन रही हैं . आज हर इंसान के पास फोन है . बहुत ही कम पैसे में लोग देश दुनिया से लोग जुड जाते हैं . सूचनाओं की भरमार है .
बीते दो दशकों से देश में एक ट्रेंड बना है कि इलेक्ट्राॅनिक मीडिया जिस खबर के साथ खेलना शुरु करता है फिर उसी तरह की खबरों का ढोल पीटना शुरु कर देता है . और देखते ही देखते वो खबर राष्ट्रीय परिदृश्य पर ट्रेंड करने लगती है . अन्य न्यूज चैनल व प्रिंट मीडिया भी उसी खबर के पीछे पिल पडते हैं . और एक सी खबरों की बाढ आ जाती है . याद करिए ऐसी खबरों को भी समय समय पर चैनलों ने खूब खेला है कि दुनिया नष्ट होने जा रही है . मानव सभ्यता अब नहीं बचेगी . और तो और जब कोई मिसाइल या बम का आविष्कार होता है तब उसके लिए भी तारीफों के इतने कशीदे गढे जाते हैं कि इनकी इतनी मारक क्षमता है कि जैसे सब कुछ नष्ट कर देगी . तबाही मच जाएगी . जबकि हो सकता है कि यह हकीकत से कोसों दूर हो .
कोरोना काल में मौतों का आँकडा , श्मशान घाट में अंतिम संस्कार का आँकडा दर्शकों को ऐसे परोसा जा रहा है जैसे आईपीएल या विश्व कप के गेंदबाजी , बल्लोबाजी के आंकडे हों . जो मानव मन को और कमजोर बना रहे हैं . लोग हिम्मत हार रहे हैं . मौतों और धधकती चिताओं को देखकर लोगों को ऐसा लगने लगा है कि उनका भी अंतिम समय आ गया है .
डर अगर सतर्कता बरतने के लिए है तब तो ठीक है लेकिन डर को यदि दिमाग में बसा लिया तो इसका दुष्प्रभाव सीधा ह्रदय पर पडता है और यह डर अकसर जानलेवा हो जाता है .
आज जब घोर निराशावाद पसरा पडा है ऐसे में जरूरत है कि व्यक्ति मन को मजबूत बनाए . सहज ही हिम्मत न हारे . आशावादिता का दामन न छोडे . विल पाॅवर सबसे बडी पूंजी है संकट काल में और दुख के सागर में डूबे दौर से निकालने में विल पाॅवर ही काम आती है . इसलिए मन को कमजोर न होने दें . मन की मजबूती ही आपकी सबसे बडी इम्युनिटी है . फिलहाल ऐसे लोगों से दूरी बनाइए जो सकारत्मकता से भरपूर नहीं है . खुद पर भरोसा रखिए . देर सबेर ही सही हालात सामान्य हो जाएंगे लेकिन हताशा में आप जो खो रहे हैं उसकी भरपाई नहीं हो सकती .
मन के हारे हार है मन के जीते जीत
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