यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment): केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, सुशासन और सामाजिक परिवर्तन का प्रश्न-डॉ रुमा परवीन

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लेखिका: Ruma ParveenPsychologist | Mental Health Expert | Government Empanelled POSH Member | Motivational Speaker

आज जब हम कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा, समान अवसर और गरिमा की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी चर्चा POSH Act, 2013 तक सीमित रह जाती है। लेकिन एक मनोवैज्ञानिक के रूप में मेरा मानना है कि यौन उत्पीड़न केवल कानूनी उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, संस्थागत संस्कृति, नेतृत्व और सुशासन (Good Governance) की भी गंभीर चुनौती है।

मेरे अनुभव में, यौन उत्पीड़न का सबसे गहरा प्रभाव व्यक्ति के मन पर पड़ता है। पीड़ित अक्सर भय, असुरक्षा, आत्मविश्वास में कमी, नींद की समस्या, लगातार तनाव, चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) जैसी कठिनाइयों का सामना करते हैं। कुछ मामलों में Post-Traumatic Stress Disorder (PTSD) के लक्षण भी विकसित हो सकते हैं।

मनोविज्ञान बताता है कि जब कोई व्यक्ति बार-बार अपमान, भय या असुरक्षा का अनुभव करता है, तो मस्तिष्क का Amygdala (Fear Centre) अधिक सक्रिय हो जाता है। इससे Cortisol जैसे तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है, जिससे निर्णय क्षमता, एकाग्रता, स्मृति और भावनात्मक संतुलन प्रभावित होते हैं।

यही कारण है कि Sexual Harassment का प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरे संस्थान पर दिखाई देता है—उत्पादकता कम होती है, कर्मचारियों का मनोबल गिरता है, अनुपस्थिति और नौकरी छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती है तथा संस्थान की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कार्यस्थल पर हिंसा, उत्पीड़न, बुलिंग और भेदभाव मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख जोखिम हैं। WHO यह भी बताता है कि Depression और Anxiety के कारण विश्वभर में हर वर्ष लगभग 12 Billion Working Days का नुकसान होता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग US$1 Trillion का आर्थिक नुकसान होता है।

इसी प्रकार ILO और UN Women सुरक्षित, सम्मानजनक और भेदभाव-मुक्त कार्यस्थलों को सतत विकास, लैंगिक समानता और प्रभावी संस्थागत संस्कृति की आधारशिला मानते हैं।

यदि हम एक प्रशासनिक अधिकारी (IAS), नीति-निर्माता या संस्थान प्रमुख की दृष्टि से देखें, तो किसी भी संगठन की सफलता केवल उसकी नीतियों से नहीं, बल्कि उसकी Psychological Safety, Ethical Leadership, Transparent Grievance Redressal और Employee Well-being से भी निर्धारित होती है।

लेकिन क्या केवल POSH Act पर्याप्त है?

मेरा उत्तर है—नहीं।

कानून दिशा देता है, परन्तु समाज परिवर्तन शिक्षा, संवेदनशीलता और व्यवहार से आता है।

यदि हमें वास्तव में Sexual Harassment कम करना है, तो हमें घर और कार्यस्थल—दोनों स्तरों पर काम करना होगा।

घरेलू स्तर पर:

बेटा और बेटी दोनों को समान सम्मान और अवसर दें।

बचपन से Consent (सहमति), सीमाएँ (Boundaries) और सम्मान की शिक्षा दें।

पीड़ित को दोष देने की बजाय उसका साथ दें।

भावनात्मक संवाद और मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करें।

कार्यस्थल पर:

POSH प्रशिक्षण को केवल औपचारिकता न रहने दें।

Internal Committee (IC) को निष्पक्ष और सक्षम बनाएँ।

शिकायतकर्ता और उत्तरदाता—दोनों के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करें।

आवश्यक होने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराएँ।

ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ हर कर्मचारी बिना डर अपनी बात कह सके।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक Carl Rogers ने कहा था:

“The curious paradox is that when I accept myself just as I am, then I can change.”

मेरे लिए यह केवल व्यक्ति पर नहीं, संस्थाओं पर भी लागू होता है। जब कोई संस्था अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का साहस दिखाती है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है।

अंत में मैं केवल इतना कहना चाहूँगी—

POSH Act केवल Compliance नहीं है। यह सम्मान, समानता, मानसिक सुरक्षा और मानव गरिमा की संस्कृति विकसित करने का माध्यम है।

जब कार्यस्थल सुरक्षित होता है, तभी कर्मचारी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं। और जब कर्मचारी मानसिक रूप से सुरक्षित होते हैं, तभी संस्थाएँ वास्तव में सफल होती हैं।

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