रिपोर्ट- सुधीर त्रिवेदी
दुकानें तो लगीं, लेकिन खरीददारों का रहा टोटा ।
बाँदा— 83 घंटे के लाकडाउन में सब्जीफरोशों की दुकानें तो लगाई गई हैं लेकिन अफसेस की बात यह है कि खरीददार कम होने के कारण सब्जी फरोशों की सब्जी खराब हो रही हैं बिक्री न होने के कारण मजबूरन सब्जी को या तो फेंका जाएगा या फिर मवेशियों को खिलाया जाएगा। सब्जीफरोशों का कहना है कि तीन दिवसीय लाकडाउन से उनका भारी नुकसान हो रहा है।
महिला सब्जी फरोश का कहना है कि केन नदी के किनारे उसकी बाड़ी है। अपने पति और बेटे के साथ रात-दिन मेहनत कर सब्जियों का कारोबार करती है। पति और बेटे बाड़ी में सब्जी तैयार करने का काम करते हैं और वह स्वयं डलिया में ताजी सब्जियां लेकर कचहरी के पास रोड किनारे आकर सब्जियां बेचती है। सारा दिन की मेहनत के बाद तकरीबन 500 रुपया बच जाता था। इसी व्यवसाय के भरोसे घर में चूल्हा तब जल पाता है, जब वह यहां से सब्जियां बेचने के बाद राशन खरीद कर घर वापस लौटती है। जब से कोरोना कर्फ्यू शुरू हुआ तब से सब्जी के इस व्यवसाय को भी चोट लगी है। अब तीन दिन की बंदी के चलते उसका परिवार बेकारी की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहा है। बंदी के तीन दिनों में सब्जियां न बिकने से आय तो मारी ही जायेगी, साथ ही सब्जियों का नुकसान होने के कारण अगले चार दिनों में जो फायदा होने वाला है वह नुकसान की भरपाई में चला जायेगा। यहीं के रहने वाले कनवारा निवासी रामप्रसाद बताते हैं कि बीते वर्ष कोरोना के कारण चार माह तक उनके परिवार को 10-10 रुपये के खर्च को लेकर मोहताज होना पड़ा था। वह भी सब्जी का व्यवसाय करते हैं। तकरीबन ढाई बीघा में सब्जी की खेती करते हैं। मार्च के महीने में अचानक से लाकडाउन हो जाने से सब्जी का व्यापार चौपट हो गया था। हालात यह हो गये थे कि उन्हें अपने बेटों के साथ सब्जियां साइकिल में बेचने को निकलना पड़ता था। श्वांस का मरीज होने के कारण ज्यादा दूरी साइकिल पर तय करना उनके लिये काफी मुश्किल था, इसलिये आसपास के ही गांवों में माटीमोल सब्जियां बेचकर किसी तरह से बर्बादी को भी रोक पाना कठिन हो गया था। इस बार फिर से तीन दिन का कर्फ्यू लग जाने के कारण सब्जियों की बर्बादी का दौर एक बार फिर से शुरू हो गई है।


