Pratap Narayan Mishra: पंडित प्रताप नारायण मिश्र की जयंती पर विशेष – जपो निरंतर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान …

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Pratap Narayan Mishra: हिंदी के प्रकांड विद्वान पंडित प्रताप नारायण मिश्र उन चुनिंदा साहित्यकारों में थे, जिन्होंने अपनी कलम से हिंदी भाषा को सही समय पर सही दिशा दी और उसकी जड़ें मज़बूत कीं, जिन पर आज हिंदी साहित्य की इमारत टिकी हुई है। भारतेंदु युग के प्रखर सिपाही रहे प्रताप नारायण ने अपने संघर्षपूर्ण जीवन के कम अवधि में हिंदी साहित्य को बहुत कुछ दिया। 38 साल की अल्पायु में 6 जुलाई 1894 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले मिश्र की 24 सितंबर को 166वीं जयंती है। उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि और समर्पित है ये लेख –

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Pratap Narayan Mishra: भारतेंदु युग के प्रमुख स्तंभ पंडित प्रताप नारायण मिश्र (Pratap Narayan Mishra) की अल्प आयु में पिता की मृत्यु के चलते औपचारिक पढ़ाई तो बहुत नहीं हो पाई, लेकिन स्वाध्याय के बल पर वह पत्रकारिता और साहित्य के प्रकांड पंडित बने। परवर्ती साहित्यकारों और संपादकों में तो उनके प्रति सम्मान का भाव था ही, पूर्ववर्ती साहित्यकार भी उनके पांडित्य से प्रभावित रहा करते थे।

Pratap Narayan Mishra: 24 सितंबर 1856 को जन्मे पंडित प्रताप नारायण मिश्र के जन्म स्थान को लेकर साहित्यकारों में कुछ मतभेद हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ सुरेश चंद्र शुक्ल ने उनके जन्म स्थान के रूप में कानपुर को मान्यता दी है। इनका मत है कि पंडित प्रताप नारायण के पिता पंडित संकटा प्रसाद मिश्र को परिवार पालन के लिए 14 वर्ष की अल्पायु में कानपुर आना पड़ा। इसलिए उनका (प्रताप नारायण) जन्म कानपुर में ही हुआ होगा। वहीं अपने संपादन में ‘प्रताप नारायण मिश्र कवितावली’ प्रकाशित करने वाले नरेश चंद्र चतुर्वेदी और डॉ. शांति प्रकाश वर्मा उनका जन्म उन्नाव जिले के बैजेगांव ( अब बेथर) को ही मानते हैं। ‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ पुस्तक में रामचंद्र तिवारी लिखते हैं-‘मिश्रा जी का जन्म बैजेगांव में हुआ हो या ना हुआ हो, उनकी रचनाओं में गांव का अंश कुछ अधिक ही है।’

आर्थिक तंगी के बीच शुरू किया मासिक पत्र ब्राह्मण का प्रकाशन

Pratap Narayan Mishra: भारतेंदु हरिश्चंद्र की परंपरा जारी रखने के लिए आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने मार्च 1883 में मासिक पत्र ब्राह्मण का प्रकाशन शुरू किया। ब्राह्मण के प्रथम अंक में अपना उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था-‘अंतःकरण से वास्तविक भलाई चाहते हुए सदा अपने यजमानों (ग्राहकों) का कल्याण करना ही हमारा मुख्य कर्म होगा’। 550 रुपए का घाटा सहकर  वह 7 वर्षों तक ब्राह्मण का निरंतर प्रकाशन करते रहे। इसके बाद प्रकाशन का दायित्व खड्गविलास प्रेस बांकीपुर के मालिक बाबू रामदीन सिंह को सौंप दिया।

हिंदी के लिए पूरी तरह से समर्पित रहे प्रताप नारायण

Pratap Narayan Mishra: पंडित प्रताप नारायण मिश्र हिंदी के बहुत बड़े हिमायती थे। अपने मासिक पत्र ब्राह्मण में हिंदी को लेकर वह जब का लेख लिखते रहते थे। एक बार समकालीन प्रकाशन ‘फतेहगढ़ पंच’ ने उनकी हिंदी पक्षधरता के खिलाफ लेख प्रकाशित किया। इस पर उनका गुस्सा बढ़ गया। उन्होंने फतेहगढ़ पंच के लेख के जवाब में ब्राह्मण में कई महीने तक लिखा। दोनों के बीच कई महीने विवाद चलता रहा। उसी बीच उन्होंने हिंदी पर एक कविता लिखी, जो काफी चर्चित हुई-

चहहु जो सांचे निज कल्यान, तो सब मिलि भारत संतान

जपो निरंतर एक ज़बान -हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान

तबहि सुधरिहे जन्म-निदान; तबहिं भलो करिहे भगवान

प्रताप मस्तमौला थे; उनकी मसखरी की मिसालें देते थे लोग

Pratap Narayan Mishra: प्रताप नारायण मिश्र स्वभाव से मस्त मौला थे। मसखरे थे। नाटकों में अभिनय भी करते थे। कानपुर की सड़कों पर वह लावनी गाते हुए कभी रिक्शे पर कभी पैदल निकलते थे। फागुन में इकतारा लेकर वह उपदेशपूर्ण, हास्य, होली, कबीर और पद आदि भी गाते थे। वह सांस बंद कर के घंटों तक मुर्दा से पड़े रहते थे। अपने कान एक या दोनों उन्हें हिलाते या फड़काते थे। तब उनके दूसरे अंग स्थिर रहते थे। उनकी मसखरी की मिसालें भी खूब चर्चित हैं।

एक बार नाटक में उनको स्त्री का रूप लेना था। मूछों का मुंड़ाना जरूरी था। भक्ति भाव से अपने पिता के सामने हाजिर हुए और बोले यदि आप आज्ञा दीजिए तो इनको (मूंछों) मुड़वा डालूं। मैं अनाज्ञाकारी नहीं बनना चाहता।’ पिता ने हंसकर आज्ञा दे दी।

Pratap Narayan Mishra: इसी तरह एक बार कानपुर म्युनिसिपिलटी में इस बात पर विचार हो रहा था कि भैरव घाट में मुर्दे बहाए जाएं या नहीं। चर्चा के बीच किसी ने कहा कि जले हुए मुर्दे की पिंडी यदि इतने इंच से अधिक न हो तो बहाई जाए। दर्शकों में प्रताप नारायण भी मौजूद थे। वह तत्क्षण खड़े होकर बोले- ‘अरे दैया रे दैया! मरेउ पर छाती नापी जाई!’ इस पर खूब जोर के ठहाके लगे।

ऐसा ही एक किस्सा पादरी से बातचीत का है। पादरी ने व्यंग्य पूर्ण लहजे में कहा-आप गाय को माता कहते हैं। उन्होंने कहा- हां। पादरी बोला तो बैल को आप चाचा कहेंगे। इस पर उनका जवाब था- बेशक रिश्ते से क्या इंकार है? पादरी ने तंज कसते हुए कहा-हमने तो एक दिन अपनी आंखों से एक बार बैल को महिला खाते देखा था। मिश्र जी ने कहा- अजी साहब, वह ईसाई हो गया होगा! हिंदू समाज में ऐसे भी बैल होते हैं।’ पादरी मुंह लटका कर चला गया।

मिश्र की लावनी सुनकर कन्नौज के कसाइयों ने छोड़ दी थी गोहत्या

Pratap Narayan Mishra: पं. प्रताप नारायण मिश्र गोरक्षा के बहुत बड़े हिमायती थे। कई कविताओं में उन्होंने गोरक्षा पर जोर दिया। अपने निबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं-‘सुनते हैं कानपुर में जो इस समय गौशाला है, उसकी स्थापना के लिए प्रयत्न करने वालों में प्रताप नारायण भी थे। एक बार स्वामी भास्कर आनंद के साथ वह कन्नौज गए और गौ रक्षा पर व्याख्यान दिया। व्याख्यान में एक लावनी कही-

बां-बां करि तृण दाबि दांत सों, दुखित पुकारत गाई है

आचार्य द्विवेदी अपने निबंध में लिखते हैं- मिश्र जी की इस लावनी में करुण रस का इतना अतिरेक था कि मुसलमानों तक पर इसका असर हुआ और एकाध कसाइयों ने गौ हत्या से तोबा कर ली थी।

38 बरस की अल्पायु में पूरी हो गई जीवन यात्रा

अपने दैनंदिन जीवन में सदैव अस्त-व्यस्त रहने वाले पंडित प्रताप नारायण मिश्र अक्सर बीमार रहा करते थे। इसी के चलते 38 वर्ष की कम उम्र में 6 जुलाई 1894 में उनकी सांसें थम गईं। अपने इस छोटे से जीवन में उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा। रामचंद्र तिवारी के अनुसार, प्रताप नारायण ग्रंथावली में उनके 190 निबंध और प्रताप नारायण मिश्र कवितावली में छोटी बड़ी 197 कविताएं संग्रहीत हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को समृद्ध किया। उनके गद्य में लोक प्रचलित मुहावरे और कहावतों की भरमार है।

Pratap Narayan Mishra: डॉ. शांति प्रकाश वर्मा ने उनके गद्य से छांटकर मुहावरे और कहावतों का पूरा कोष ही तैयार कर दिया। मुहावरा कोष लगभग 110 प्रश्न का है और कहावतें कुल 16 पृष्ठों में। मिश्र जी ने अपने लेखों में संस्कृत के जिन सूक्तियों और श्लोकों का उदाहरण दिया है, उनकी संख्या 220 है। उनके लेखन में उर्दू और फारसी की सूक्तियां कुल 66 हैं। (‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ लेखक-रामचंद्र तिवारी, पृष्ठ-68)

पंडित प्रताप नारायण के असमय निधन पर पूर्ववर्ती साहित्यकार बालकृष्ण भट्ट ने कुछ यूं लिखा था-‘प्रातः स्मरणीय बाबू हरिश्चंद्र को हिंदी का जन्मदाता कहें, तो प्रताप नारायण मिश्र को निस्संदेह उस स्तनअधन्या दूध मोहि बालिका का पालन पोषण कर्ता कहना पड़ेगा, क्योंकि भारतेंदु हरिश्चंद्र के उपरांत उसे अनेक रोग-दोष से सर्वथा नष्ट न हो जाने से बचा रखने वाले यही देख पड़े’।

Pratap Narayan Mishra: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1906 की सरस्वती में ‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र’ पर एक निबंध लिखा था। वह लिखते हैं-‘इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रताप नारायण में अपार प्रतिभा थी। प्रताप की कविता में प्रतिभा के प्रमाण कई जगह मिलते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार प्रताप नारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट जी की एक साथ चर्चा करते हुए लिखा-‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडिशन और स्टील ने किया था’। (हिंदी साहित्य का इतिहास- पृष्ठ 467)

∆ गौरव अवस्थी, रायबरेली/ उन्नाव

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